गुरू वक्त मुक्ती

बिन गुरू वक्त मुक्ती नहीं पावे, बिना भक्ति सत लोक न जावे

आतम तृप्ति वाले को कोई भी हालत नहीं
उलझाएगी। निरइच्छा वाले को कोई भी जीत नहीं सकेगा।
भगवान भी आकर आजमाए तो वह शरीर ही नहीं है तो
कहीं भी Fail नहीं होगा। हर एक परीक्षा में पास होगा।

भ्रम में नहीं आओ कि गुरू अधिक शक्तिवाला है।
जो वो है सो मैं हूँ।

वह शक्कर कैसी जिसमें मिठास न हो।
वह ब्रहमज्ञान कैसा जिससे आनन्द न आये।

कोई कहता है मैं आत्मा हूँ पर आनन्द नहीं है,
यह झूठ है। देह अध्यास मनुष्य को रूलाएगा। शरीर
करके भी कुछ करना नहीं है सब कुछ अपने आप होता
है शरीर को प्रारब्ध अपने आप चलायेगी पर मैं इच्छा से
न चलाऊँ। राजा कुछ भी नहीं करेगा, वज़ीर की सलाह
से सब होता है। प्रकृति अपने आप करती है तुम पुरूष
परमात्मा है।

गुरू ज्ञान नहीं देता है पर तुम अपनी भावनाओं से
अमानत लेकर जाओगे। जितनी अपनी कृपा करेंगे उतना
ऊपर उठेंगे। निर्दोष पर दोष लगाते हो यदि ऐसा कहते हो
कि गुरू प्यार नहीं करता।

खाली आएगा भरकर जाएगा, भरे को गुरू क्या
भरेगा? किसी का भी दिल में नाम रूप बिठा कर आयेंगेतो गुरू पहले सबके नाम रूप भुलवायेगा। जो सुना है,
देखा है, जाना है वह सब भुलाना है। भुलाने के सिवाय
शान्ती नहीं आयेगी। करमण्डल में कचड़ा पड़ा होगा तो
पूड़ी पकोड़े नहीं पड़ेगे। भान्डा भाव अमृत तित डाल ।
भाव से भरे हृदय में ही अमृत जैसा ज्ञान पड़ेगा।

गुरू का दर्शन नहीं पर गुरू के वचन हृदय से
लगाओ। यदि दर्शन से सब कुछ मिल जाता तो फिर अन्धे
को तो उम्मीद है कुछ न मिले। पर यहाँ तो सूरदास भी
आत्मा सुनकर तर गये। दर्शन किसे कहते हैं ‘जहाँ-तहाँ
अपना आप देखना यही दर्शन है। सम देखो सबको,
आत्मा जग को।

जब है ही निराकार तो दर्शन किसका करोगे?
मिलेंगे किससे? जानेंगे किसको? जब हूँ ही मैं दूसरा हो
तो जाना जाय। अद्वेत में कुछ भी करना नहीं पड़ता है
केवल अपने को जानना पड़ता है। जिसने जगत को
मिथ्या समझा वह जगत के कौन से काम-काज करेगा।

मन दिखता नही पर दिखाता बहुत है
मन दिखता नही पर दिखाता बहुत है

जो जगत को सत्य समझता है वह नहीं करे तो भी करे।
बाहर से भले ही चुप करके बैठा हो तो भी मन चलता
रहेगा। गुरू, ज्ञानी करता हुआ भी नहीं करे। अपने से
जुदा कुछ समझता ही नहीं है तो इच्छा कैसे होगी। सब
कुछ मेरे में समाया हुआ है। अब कौन सी वस्तु जुदा है
जो इच्छा करूँ।

बिन गुरू वक्त मुक्ती नहीं पावे, बिना भक्ति सत लोक न जावे।
पिछलों की जो धारे टेका, जिनको आँख से कभी नहीं देखा।
पोथिन में सुनी उनकी महिमा, टेक बाँध मन सबका भरमा ।

वक्त का जीता जागता गुरू चाहिए, मरे हुए गुरूओं
की जो टीकायें पढ़ते हो जिन्हें आँख से नहीं देखा है
उनका आधार लेते हो।

वृक्ष
को आज की

धूप चाहिए ऐसे
ही मुक्ति के लिए आज का गुरू चाहिए। भगवान एक से
अनेक बनाता है खेल करने के लिए, अपनी शक्ति दिखाने
के लिए।

द्वेत में मजा किया है पर है अद्वेत। हमारी अद्वेत
पर नज़र है पर अज्ञानी की द्वेत पर।

कभी भी ऐसे शब्द नहीं बोलो जो कोई गिरे,
किसी का दिल मायूस हो जाये। सबको ऐसे वचन बोलो
जो वो चढ़े आत्मा में। आसमान में उड़े कि मैं भगवान हूँ।
गिरे हुओं को ऊपर उठाना तुम्हारा फर्ज है। गीता में
लिखा है हे अर्जुन काम को ज्ञान की तलवार से काट तो
मुसलमानो ने तुहिर कराने का रिवाज निकाला, इन्द्रिय
को कटवाया पर उल्टा काम अधिक बढ़ गया, चार-चार
शादियाँ करते हैं एक स्त्री से तृप्ति नहीं होती है मतलब
ज्ञान ठीक नहीं उठाया है।

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