black hole hindi

ब्लैक होल की तस्वीर लेना लगभग असंभव क्यों था ?

क्योंकि हमसे सबसे नजदीक का ब्लैक होल भी करीब 3000 light years दूर है। जैसा कि आप जानतें है दूर से चीज़े छोटी नजर आती हैं, तो अपने सबसे नजदीकी ब्लैक होल का तस्वीर लेने के लिए भी हमें जिस size का telescope चाहिए वो हमारे ग्रह से भी काफी बड़ा होगा । क्या आप इतना बड़ा telescope बना सकते हैं ? तो अब आपके मन में सवाल होगा कि फिर उस ब्लैक होने का तस्वीर कैसे लिया गया जो आजकल बहुत चर्चे में है।

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यह तस्वीर Messier 87 की है। यह हमसे करीब 53•5 million light year दूर है। इसका mass 3•5 billion सूरज के करीब है। इतना दूर होते हुए भी size के हिसाब से हमारे लिए तस्वीर लेना सबसे ज्यादा आसान इसी का था: अगर इसे आसान कहें तो !!!

ब्लैक होल की साइज


हमारे perspective में यह विशाल ब्लैक होल भी Tiny है। कितना छोटा _ 40µas (40 micro arc second) बस!!!! यह कितना होता है ? इसे समझने के लिए मान लेते है कि हमने पूरे आसमान को 180 degree में बाट दिए।फिर हर डिग्री को 60 arc_minute में बांट दिए। अब एक arc_minute को 60 arc_second में।1 arc_second को 100 टुकड़ों में बांटिए। फिर 100 टुकड़े फिर 100 टुकड़े। यह है size M87 का हमारे perspective में। यह size हमारे टेक्नोलॉजिकल capabilities का मजाक बना कर के रख देता है।

मतलब इस size का तस्वीर लेने के लिए हमें अपनी धरती के size की telescope चाहिए। तो ना ही हम उतना बड़ा telescope बना पाएंगे और ना ही हमें वो तस्वीर मिलेगी। तो क्या इसे छोड़ दिया जाए ? हम इंसान मानते कहां हैं, और फिर जन्म हुआ प्रोजेक्ट “Event Horizon Collaboration” का।

दुनिया भर के 200 से ज्यादा scientist 100 अलग अलग institutions से एक साथ आए। इन अलग अलग culture,race,geographical location के व्यक्तियों को co ordinate करना मुश्किल parts में सबसे आसान था।

जितना बड़ा प्रोजेक्ट उतनी बड़ी मुश्किले। Power failure, data storage उनमें से कुछ हैं।

तस्वीर कैसे ली

एक बहुत बड़े telescope के बजाय दुनिया भर में फैले 8 अलग अलग telescopes को Very Long Baseline Interferometry technic के जरिए inter-connection करके एक बहुत बड़ा virtual telescope बनाया गया। जैसा कि आप जानते हैं telescopes को civilization से दूर लगाया जाता है ताकि city lights night sky को pollute ना करे, तो remote location के वजह से होने वाली परेशानियां तो bonus हैं। ये सारे telescope बर्फीले south pole से लेकर आग उगलती रेगिस्तान से लेकर पर्वत चोटी, सुप्त ज्वालामुखी तक पूरे विश्व में फैले हुए हैं। ऐसे वातावरण में सालो तक काम करना निश्चित रूप से अपने आप में काफी चुनौती पूर्ण रहा होगा। इन सारे telescopes को एक target दिया गया Messier 87। अगर अब आपको लग रहा हो कि telescope से related समस्याएं दूर हो गई तो ज़रा ठहरिए।

दुनिया भर में telescope का फैला होना ही पर्याप्त नहीं है, उनका एक साथ एक telescope की तरह काम करना भी जरूरी है। पर मजेदार बात यह है कि ये सारे telescope एक साथ काम करने के लिए बने ही नहीं थे। इस चुनौती को पूरा करने के बाद सबको एक atomic clock (loses just one second in 10 million years) के precision के level पर जोड़ा गया। एक के बाद एक समस्या का सामना करते हुए scientist finally उन्हें sync में लाने में सफल हुए।

पर telescope के हिस्से का काम अभी भी पूरा नहीं हुआ है। सारे telescopes के सामने का आसमान साफ हो वह भी एक साथ ही भी जरूरी था। इन सारे conditions के हिसाब से साल में सिर्फ एक ही ऐसा मौका आता है।

इतना कुछ होने के बाद अब बारी आती है data collection की और उन्हें एनालिसिस करने की। जो data collect हुआ उसके अनालिसिस में करीब 2 साल लग गए। हर दिन करीब 350 TB data daily analyse होता था। दो अलग अलग super computer लगे हुए थे इस काम में। अलग अलग टीम को एक दूसरे के isolation में same data से analysis करने दिया गया ताकि last में यह मिलाकर देखा जाए कि सबके result same हों। गलती की कोई गुंजाइश नहीं है। सच पूछिए तो इतना ज्यादा data था कि hard disks को ही एक centre से दूसरे सेंटर ले जाना सबसे ज्यादा fast तरीका था data ट्रांसफर का। ऐसे कंप्यूटर programes लिखे गए जिसकी पहले कभी जरूरत नहीं पड़ी थी।

और तब जाकर पहली बार हमलोग ब्लैक होल की तस्वीर लेने में सफल हुए।

Event Horizon Telescope project 2009 में शुरू हुआ और 2019 में हमें इससे पहला तस्वीर मिला।

हैं ना कमाल की!!!

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