दुख अहंकार को तोड़ते हैं

कोई भी नयी बात दुनिया में नहीं होती जो केवल हमारे साथ
हुई हो।

चिन्ता ताकी कीजिए जो अनहोनी होय।
कभी भी मन को आने नहीं दो जो आकर गिराये कि
तुम्हारे साथ कुछ हुआ है।

मन को जवाब दो या तो टेप
चला दो तो हर एक टेप सुने ऐसा तो होता है।

अडौल
होकर रहना चाहिए जैसे इम्तेहान के समय विद्यार्थी
कितना न सुजाग होकर बैठता है कि पेपर अच्छा देकर
आऊँ, कहीं फेल न हो जाऊँ ऐसे सुख दुख दोनों परीक्षा
हैं दोनों के आने पर सावधानी की जरूरत है झपकी भी
नहीं आनी चाहिए नहीं तो पेपर छूट जाएगा Marks
(नंबर) पूरे नहीं मिलेंगे।

भगवान तो ऊपर चढ़ने के लिए
दुःख भेजेगा जैसे इम्तेहान देकर पास होकर एक क्लास
ऊपर चढ़ते हैं ऐसे दुख भी एक सीढ़ी है परमात्मा तक
पहुंचने के लिए।

दुख नहीं होते तो मनुष्य को वैराग्य नहीं
आता हजारों पाप रोज करता, अहंकार करता पर दुख
अहंकार को तोड़ते हैं। जो काम गुरू भी नहीं करता वो
दुख करते हैं।

गुरू वैराग्य दिलाकर थक जाता है पर जब
खुद अनुभव होता है जगत की बेबकाई और बेवफाई का
तो अंदरूनी तीव्र वैराग्य आ जाता है।

दुख सुखों की
सुंदरता है, वारूं सुख दुःखों पर।

सत पुरूष तो दुख
माँगकर लेते हैं। बिच्छ गोदरी में रखते हैं कि यह डंकलगाता रहे तो भगवान न भूलें ।

सुख अंधा करते हैं, दुःख
आंखे खोलते हैं।

खौफनाक (भयानक) सपना देखने से
नींद से जाग उठते हैं पर यदि अच्छा सुखों का सपना है
तो नींद अधिक अच्छी आयेगी।

ज्ञानी सदा जागती जोत
है। वह अज्ञान की नींद में सोता नहीं है।

जहां अज्ञानी
सोया पड़ा है वहाँ ज्ञानी जागता है।

दादा रोज सत्संग में
डाक्टर की बात करता है कि उत्तरायण में शरीर छोड़ा
है अब तो प्रत्यक्ष नज़र आता है कि उत्तरायण दक्षणायण
कैसे कहा गया है गीता में।

गुरू सब करके दिखाता है।
जिसने गुरू को डोर अर्पण की है उसे गुरू अपने से मिलाकर
एक कर देता है जैसे सूर्य सागर का पानी अपने आप
खींचकर फिर बरसात के रूप में मीठा करके बरसाता है ऐसे
आत्मा परमात्मा से मिलकर एक होती है।

परमात्मा अपने
प्यारों को खींचकर अपने से मिलाकर एक करता है।

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