एक कामकाजी मा की कलम से

एक कामकाजी मां की कलम से

कितना मुश्किल होता है एक माँ के लिए छोटे बच्चे को सोता हुआ

छोड़कर घर से बाहर अपने जॉब पर जाना ?

इस तकलीफ को सिर्फ एक माँ ही समझ सकती है !बच्चा उठेगा मम्मा मम्मा करके थोड़ी देर रोएगा, जब माँ

नही दिखेगी तो चुपचाप चप्पल पहन कर अपनी दादी या घर के किसी बड़े सदस्य के पास चला जाएगा। समय

से पहले ऐसे बच्चे बड़े व जिम्मेदार होते जाते हैं, लेकिन माँ अपने जिम्मेदार

बच्चे को भरी आँखों से ही देखती है,

कि भला अभी इसकी उम्र ही क्या है ?पता नही एक माँ में इतनी हिम्मत इतनी ममता इतनी ताकत आती कहाँ से

है ? किसी से कुछ कहती भी नही। बस आँखे भरती है, डबडबा जाती है, फिर खुद को कंट्रोल करती हुई भरी

आँखों को सुखा लेती है।जॉब के साथ साथ घर परिवार संभालना, बच्चों के टिफिन से लेकर हसबैंड के कपड़ो

तक, ब्रेकफास्ट से लेकर रात के डिनर तक,

कितना बेहतर मैनेज करती है फिर भी मन में लगा रहता है कि बच्चे

को बादाम पीस कर नही दे पाई वो ज्यादा फायदा करता।

कहीं न कहीं कुछ छूटा छूटा सा लगा रहता है।इतना

काम अगर स्त्री अपने मायके में करे तो वहां उसको बहुत तारीफ और

प्रोत्साहन मिले या कह लें कि वहां उसे

कोई करने ही न दे, सब सहयोग करें।बच्चे का नाश्ता खाना सब बना कर जाना,

फिर बच्चे ने क्या खाया क्या

नही? इसकी चिंता में लगे रहना।सच में एक माँ घर से बाहर, बच्चे से दूर कभी रिलेक्स ही नही रह पाती। घर

पहुँचो तो बच्चे के टेढ़े मेढ़े बाल,

गलत ढ़ंग से बंद हुआ शर्ट का बटन देखकर एक साथ बेहद ख़ुशी और पीड़ा

दोनों होती है, मुँह फिर भी कुछ नही बोलता बस आँखों को रोकना मुश्किल हो जाता है।

बच्चे के सामने सब

कुछ ज़ब्त करके प्यारी मुस्कान देना एक माँ के ही बस का काम है।

बाहर से जितनी मजबूत अंदर से उतनी ही

कमजोर होती हैं माँ। सुबह से छूटा हुआ बच्चा जब दौड़कर गले लगता है तो मानो सारी कायनात की खुशियाँ

मिल गयी, फिर वैसी ख़ुशी वैसा सुकून स्वर्ग में भी नही मिले। सारे दिन की भागदौड़ भूलकर उस पल ऐसा

लगता है कि जैसे इस सुकून के लिए सदियाँ गुजर गयी।कभी कभी सोचती हूँ कि जेंट्स लोग जो इतने रिलेक्स

 एक कामकाजी मा की कलम से

रहते है परिवार और बच्चों की तरफ से उसमे बहुत बड़ा हाथ स्त्रियों का होता है।एक पुरुष आफिस से लौटता है

तो कहीं चौराहे पर चाय पीते हुए अपने दोस्तों के साथ गप्पें मारता है फिर रात तक घर आता है उसी जगह एक

स्त्री अपने काम को खत्म करने के बाद सिर्फ और सिर्फ अपने घर अपने बच्चे के पास पहुंचती है जबकि अच्छा

उसे भी लगता है बाहर अपनी फ्रेंड्स के साथ गपशप करते हुए चाय की चुस्की लेना। पर अपने बच्चे तक पहुंचने

की बेताबी सारी दुनिया की खुशियोँ को एक ओर कर देती है।मानती हूँ महिलाओं, लड़कियो को जॉब करना

चाहिए, इससे कांफिडेंस आता है पर सच है कि बहुत कुछ हाथ से जाता भी है !!

सारांश –

कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खौना पडता है, आजकल कै भीषण महंगाई कै दौर मैं, बच्चों के

उज्जवल भविष्य निर्माण की खातिर मां बाप दोनो का आय अर्जित करना आवश्यक हो गया तभी वह स्कूल/

कालेज की मनमानी फीस एवं अन्य खर्चों का बोझ उठा पाएँगे, लेकिन इस सब के लिए अपने बच्चों की

बाललीला, उन्हें बढते हुए देखने का सुख बहुत पीछे रह जाता है, रह जाता है तो सिर्फ छोटी सी उम्र मैं गंभीर/

परिपक्व हुए बच्चे ! अगर एकल परिवार है तो झूला घर मै अनाथों की तरह पलते बच्चे जिन्हें शाम के समय मां

बाप के लौटने के दस मिनट पहले धौ पौंछ कर चमका दिया जाता है ! यदि संयुक्त परिवार है तो परिजनों की

बेतुकी मांगो को पूरा करत हुए बेबस मां बाप जिन्हें बारम्बार यह स्मरण दिलाया जाता है कि ” तुम्हें क्या कमी है

तुम तो दोनों कमाते हो ” भले ही दोनों मिलकर दस हजार रुपये मासिक ही कमाते हो !

खैर मन के उदगार थे जो अभिव्यक्त हो गए, किसी का दिल दुखाना उद्देश्य नहीं था ! लेकिन फिर भी यदि किसी

को बुरा लगा हो तो ह्रदय से क्षमाप्रार्थी हूं !

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