गुरु हमें जीवन जीने का रास्ता बताते है चलना हमें खुद ही होता है

गुरु हमें जीवन जीने का रास्ता बताते है चलना हमें खुद ही होता है

🥀जो सबका भला चाहता है सबको जिताना चाहता है वो हारता नही बल्कि ” हार ” पहनता है ।
🥀किसी भी बात में ना ओवर , ना लोवर रहना है,, बेलेन्स में रहना है ।
🥀सारी सृष्टि हमारे लिए विद्यालय हैं ।
🥀गुरु हमे जीवन जीने का रास्ता बताते है चलना हमे खुद ही होता है ।
🥀बी क्लीन राधर धेन क्लेवर ,,,,,,,चतुर नही मन से शुद्ध बन ना है ।
🥀जिज्ञासु माने वक़्त आने पर कछुए की तरह अपने अंग समेट ले, और जरूरत पड़ने पर निकाल ले ।
🥀जो भी सेवा मिली है उसको खुशी से करें, भागे नही, ” कृष्णा ” भगवान थे लेकिन अपना ग्वालो वाला काम खुशी से किया ।
🥀मनुष्य जीवन मिला है
हमारा भाग्य
🥀गुरु मिले
हमारा अहोभाग्य
🥀ज्ञान जीवन मे लगा
हमारा सौभाग्य
🥀शुक्राने सतगुरु जी के हरि ॐ ।

Divine Geeta Bhagwan Patra

कोई लिखता है कि घर वालों में भगवान नहीं
देखने में आता। अपने वाले जो इच्छा रखते हैं कि हमें
प्यार करो हमारी होकर रहो उन इच्छा और स्वार्थ वालों
को भगवान समझकर जाकर प्यार करेंगे तो भूल जायेंगे।
ज्ञानी को किसी के लिए भी नफरत नहीं है यही प्यार है
बाकी प्यार कोई करने का नहीं है। Love is not an action
but love is a state of mind
. मीरा कहती है ‘भगत देख
राजी हुई जगत देख रोई।’ ‘हम भक्तन के भक्त हमारे,
कृष्ण ने कहा,-सुन अर्जुन ये प्रतिज्ञा हमारी।’ ज्ञानी और
अज्ञानी के ख्यालों में रात दिन का फर्क है फिर दिन और
रात एक कैसे होंगे? जहाँ वह सोये पड़े हैं वहां वे जाग
रहे हैं फिर कैसे सोये हुए जागे मनुष्य से मिल सकेंगे।
ज्ञानी अन्दर में सबके लिए करूणा रखता है बाकी
वास्ता किसी से भी नहीं है। जो हमें इस राह पर
चढ़ाये आत्मा याद कराये वे ही हमारे सम्बंधी और सगे
दोस्त हैं जो शरीर याद दिलाए उनसे दस फुट दूर रहना
चाहिए। ज्ञानी को सारी दुनिया से मौन है केवल आत्माकार
से बोलता है और सबको यह निश्चय कराता है। उसका
किसी से भी दुनिया में Connection नहीं है। पता नहीं देह
का उनको फिर औरों से क्या मतलब है किसी से भी
वर्तण नहीं है केवल साक्षी दृष्टा है ना जगत का पर अपने

प्रैक्टिस मेक मेन परफेक्ट
प्रैक्टिस मेक मेन परफेक्ट

आप का दृष्टा है। वह जगत देखता ही नहीं है तो प्यार
किससे करेगा। उसका प्यार तो अपने से ही है। है ही
भगवान पर तुम्हारी झूठी मैं तीनों कालों में ही नही है।
मीरा ने कृष्ण को ही जहाँ-तहाँ देखा पर अपने आप को
नहीं देखा यही उसका अज्ञान था। तुम भी कहते हो कि
मुझे गुरू जहाँ-तहाँ नज़र आता है माना नाम रूप पर
अपना आप देखने से ही सच्ची शान्ति आएगी। नाम रूप
से ऊपर उठो निराकार में टिको ओम में रहो। दुनिया के
चाहे लाखों अनुभव हों उससे कोई आत्मसाक्षात्कार का
वास्ता नहीं है। जैसे कितने ही कहते हैं कि तुमने शादी
नहीं की है कि तो तुम्हें कौन सा अनुभव है सो ही ये अनुभव
तो कुत्ते और सुअर को बहुत अधिक है तो फिर उन्हें जल्दी
आत्मसाक्षात्कार होना चाहिए। ध्रुव भक्त, प्रहलाद, मीरा,
विवेकानन्द सबको छोटी उम्र में साक्षात्कार हुआ। बाहर का
कोई अनुभव नहीं चाहिए । खाली और साफ दिल में भगवान
जल्दी बैठेगा।।

178 Shares
Share via
Copy link
Powered by Social Snap