Guru vaani 26 June 2019

Guru vaani 26 June 2019

गुरु वाणी २६ जून सत्संग बहुत अच्छा होता है, आना भी चाहते हैं, पर क्या करें, कुछ न कुछ काम अटक जाता है।

समय ही नहीं मिल पाता और फिर वैसे भी संडे… एक ही दिन तो होता है थोड़ा देर से सोकर उठने

के लिए और शाम को बच्चों को मॉल-वॉल घुमाने के लिए। अच्छा ठीक है मैं निकालता हूं कुछ समय

और इस बार पक्का आता हूं’ – ऐसा लोग अक्सर सोचते रहते हैं। सत्संग में आने वाले एक दंपती के

सत्संग पूरा होने से पहले ही जाने पर पूछा तो जवाब मिला कि आज कामवाली बाई को जल्दी आना

है इसलिए सत्संग बीच में छोड़कर जाना पड़ रहा है, और एक सुझाव भी मिला कि क्या सत्संग का

समय थोड़ा आगे-पीछे नहीं कर सकते हैं ?

Guru vaani 21 June 2019
Guru vaani 21 June 2019

यही सब कहते-सुनते जिंदगी गुजरती जा रही है, लेकिन सत्संग के लिए समय नहीं निकल पाया

है।अच्छा जब किसी दिन कुछ खाली समय दिखता है तब सोचते हैं कि चलो आज सत्संग चलते हैं।

यहां तक दो बातें तो स्पष्ट हैं। पहली या तो वास्तव में हम सत्संग में जाना ही नहीं चाहते। बस वर्षो से

स्वयं को बहका रहे हैं और यदि जाते भी हैं तो उसको महत्व नहीं देते। दूसरी हमें अपनी दिनचर्या

को सुनियोजित करना ही नहीं आता और अपनी जिंदगी को छोटी-छोटी मामूली सी बातों के हिसाब

से चला रहे हैं।

Divine Guru Ji Video

याद रहे कि सत्संग में जाने वालों की दिनचर्या, उनकी परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारियां

ज्यादा अच्छी तरह से पूरी होती हैं। उनका जीवन अस्त-व्यस्त नहीं अपितु व्यस्त और मस्त रहता

है।आध्यात्मिक सत्संग से ज्ञान मिलता है, जिससे जीवन जीने में स्पष्टता आती है और यह स्पष्टता

सिर्फ आध्यात्मिक यात्रा में ही नहीं अपितु जीवन के हर क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखाती है। फेसबुक के

फाउंडर भी अपने कठिन समय में हमारे देश आए थे और एक आध्यात्मिक संत के यहां उन्होंने

शरण ली, उनसे ज्ञान अर्जित किया और फिर अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति की।

आप अभी युवा हैं तो अध्यात्म में आने के लिए वृद्ध होने का इंतजार न करो। युवावस्था में ही

अध्यात्म पथ पर चल दो क्योंकि बासी फूल तो मूर्ति पर भी नहीं चढ़ाए जाते।अक्सर व्यक्ति सत्संग में

तभी आता है जब उसके अपने उसको लताड़ते हैं, उसको चोट लगती है और फिर वह कहीं सत्संग

की ऐसी जगह तलाशता है जहां उसको मन की शांति मिल सके मगर उम्र के इस पड़ाव तक आते-

आते उसकी आदतें इतनी पक चुकी होती हैं कि फिर सत्संग से भी उसका बहुत कुछ भलाहोने

वाला नहीं है। अपनी दिनचर्या में व्यर्थ कार्यों में बर्बाद होते समय को बचाओ और उसको स्वाध्याय

में लगाओ। आप पाएंगे कि उन्हीं चौबीस घंटों में से स्वयं के लिए काफी समय निकाल पा रहे हैं।

जन्मों-जन्मों के भाग्य जागते हैं तब कहीं जाकर सत्संग का सौभाग्य मिलता है।

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