ईश्वर कैसे जाना जाता है ?

ईश्वर कैसे जाना जाता है ?

प्रश्न- ईश्वर कैसे जाना जाता है?

उत्तर- ईश्वर भी अनुभव से जाना जाता है ।

प्रश्न- इसका अनुभव किसको होता है?

उत्तर- आत्मा को ही परमात्मा का अनुभव होता है।

ईश्वर

प्रश्न- यह अनुभव कब होता है ?

उत्तर- जब मन के तीन प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं।

प्रश्न – यह तीन प्रकार के दोष कौन से हैं?

उत्तर- मल,विक्षेप,आवरण- ये तीन दोष है।

प्रश्न – इन की परिभाषा क्या है ?

उत्तर- मन में दूसरों को हानि पहुंचाने का विचार तथा पाप के जो आत्मा पर संस्कार हैं

उसका नाम ‘मल’ है, लगातार विषयों का चिंतन करने अथवा मन के स्थिर ना रहने का नाम

‘विक्षेप’ है, संसार के नाशवान् पदार्थों के अभिमान का मन पर पर्दा पड़े रहने का नाम ‘आवरण’ है।

प्रश्न- इन तीन प्रकार के दोषों को किस प्रकार दूर किया जाता है ?


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उत्तर – इनके दूर करने के तीन साधन है ।

प्रश्न- वह कौन कौन से हैं ?

उत्तर- ज्ञान, कर्म और उपासना

प्रश्न – ज्ञान, कर्म और उपासना से क्या मतलब है ?

उत्तर – जो पदार्थ जैसा हो, उसको वैसा ही समझना। जड़ को जड़, चेतन को चेतन, नित्य को नित्य, और अनित्य को अनित्य जानना ‘ज्ञान ‘ है ।

शरीर, समाज तथा आत्मा की उन्नति के लिए दान परोपकार व यज्ञादि करना कर्म है । ईश्वर के उपकारों का चिन्तन व अपने दोषों को सुधारने का नाम ‘उपासना’ है।

Hindi Story

कल्पना करो, एक मनुष्य जाड़े का सताया हुआ है । अगर वह जाडा दूर करने के लिए जल के समीप जाता है, तो यह उसका अज्ञान है, ज्ञान नहीं।

जाडा तो तभी दूर हो सकता है जब पहले उसे अग्नि का ज्ञान हो, फिर जाड़ा शांत करने के लिए आग

की प्राप्ति के लिए कर्म करें और फिर अग्नि के समीप जा कर जाडा रूपी दोष को अग्नि के गुण

गर्मी से दूर करें ।

तात्पर्य यह है, ज्ञान से ‘मल’ कर्म से विक्षेप और उपासना से ‘आवरण’ दूर होता है तब कहीं परमात्मा का अनुभव होता है ।

प्रश्न- इसे थोड़ा और स्पष्ट करो। ज्ञान से मल, कर्म से विक्षेप और उपासना से आवरण दोष दूर कैसे होते हैं?

उत्तर- ज्ञान के द्वारा समझ लेना कि संसार के सब प्राणी और सब पदार्थ नाशवान हैं ,

इसीलिए दूसरों के अधिकारों को छीनने का भाव ना रखना ही ‘मल’ दोष दूर होना है।

किसी के मन में ‘विक्षेप’ अर्थात चंचलता तब उत्पन्न होती है, जब वह संसार की पदार्थों को जीवन

का उद्देश्य समझकर उनका प्रयोग करता है ।

संसार के पदार्थ वास्तव में साधन तो हैं परंतु साध्य अर्थात जीवन का उद्देश्य नहीं है ।

यह सिद्धांत समझ कर जो कर्म किया जाता है वह मनुष्य को जल में कमल की भांति संसार की


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ममता से लिप्त नहीं होने देता ।

निष्काम कर्म से ‘विक्षेप’ दूर होता है। मनुष्य के मन पर अहंकार या अभिमान का जो एक पर्दा होता

है, यह परमात्मा प्रदत्त वस्तुओं को अपनी समझता है।

मेरा धन , मेरी स्त्री, मेरा बल, मेरा राज , मेरी हुकूमत आदि आदि। अभिमान में वह दूसरों को सताता है ।

वह समझता है मुझसे बड़ा कोई नहीं परंतु जब यह ज्ञान पूर्वक कर्म करता है, मन और इंद्रियों को

बाहर के विषयों से हटाकर शक्तियों को हृदय में एकाग्र करता है और समझता है कि मेरे अंदर परमात्मा है और मैं परमात्मा के निकट हूं ।

बस इसी उपासना से अहंकार अर्थात ‘आवरण ‘दोष दूर हो जाता है। इस प्रकार तीनों दोषों को तीनों साधनों से दूर करने का निरंतर अभ्यास परमात्मा का अनुभव करा देता है।

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