मन को आखिर चाहिए क्या?

मन को आखिर चाहिए क्या?

  • गुरु के वचन धीरे धीरे हमारे अंदर जगह बनाते है। हमे धीरज नहीं छोड़ना है। जो गुरु कहते है वो मुझे करते जाना है। निरंतर। उसमे कोई सिमा नहीं है। यहां से ज्ञान सुन कर जाने के बाद बाहर जाके फिर से माया कि बात हो जाती है तो इसका मतलब है कि गुरु और मेरी मत एक नहीं हुई है।

  • अपनी मत को गुरु की मत में लीन कर दो। में ही गुरु का मीत हूं, सजन हूं। में अद्वितीय हूं। मेरी किसी के साथ कोई तुलना नहीं है। अपने आप को गिराओ मत। हम जिस बूंद के सुख के लिए भटक रहे है, गुरु हमें पूरा सागर बनाना चाहता है।

  • मन को आखिर चाहिए क्या? जो आजतक चाहा वो मिला है फिर भी मन वैसा का वैसा बेचैन क्यों है? मन को वास्तव में कुछ नहीं चाइए। आज जांच करो कि आखिर मेरी मौज चली कहा गई है? खड़े हो जाओ। निश्चय में बहुत शक्ति है। एक बार तुमने दृद निश्चय कर लिया तो तुम्हे कोई रोक नहीं सकता।

  • मेरी गुरु के लिए आमरण भक्ति है। अन्तिम श्वास तक मेरी डोर गुरु के हाथ में है। मन को चाइए शांति। अपने अंदर की अशांति को शांत करो तो बाहर शांति ही है। गुरु से sharing करो। निर्भय रहो। जैसे गुरु के साथ tender भरा हैं, समय कम है, ये bridge आज ही बनाना है।

  • गुरु मृगतृष्णा के जल का बोध करवाता है। फिर हम वहां बैठ नहीं जाते है। मुझे हर पल ये आभास हो की परमात्मा मेरे संग है। संसार मृगतृष्णा का जल है, और हम अपना पूरा समय वही दे रहे है।

  • गुरु का पूरा संग करो। एक कि खोज करली तो दर दर भटकना नहीं पड़ेगा। सदा वसत तुम साथ। ब्रह्म बोध करो, एक ही सच है। सच का आधार लो। चाहे पूरा संसार मृगतृष्णा का जल लेने बैठा हो, पर मुझे सच समझ आ गया है।

  • धीरज बहुत जरूरी है। एक कुम्भार भी मटके को तब तक पकड़ के रखता है जब तक वो बन ना जाए। परिणाम तो आएगा ही। धीरज नहीं छोड़ो।

  • सोते उठते, हस्ते बोलते परमात्मा को संग महसूस करो। शुक्राने के साथ उठो, शुक्राने के साथ सो जाओ। Charming बनी रहेगी।
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