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अमेरिका के बाद कोई भी देश चाँद पर क्यों नहीं उतरा है?

आज से लगभग 50 साल पहले, दो अमेरिकियो नें चंद्रमा को छुआ और वे इसकी सतह पर चले भी थे। अब, नासा इसे फिर से करने की कोशिश कर रहा है, एक महत्वाकांक्षी परियोजना के दुआरा, 2020 तक चंद्रमा पर मनुष्यों को वापस लाने की कोशिशों में लगा हुआ है। लेकिन अगर नासा आठ वर्षों में यह कर सकता है तो कुछ आश्चर्य है कि वापस जाना इतना मुश्किल क्यों है।

इसका कारण है कि चंद्रमा के मानव-अभियान के लिए सक्षम राकेट जो पृथ्वी की कक्षा को पार करने में समर्थ हो, ऐसे राकेट उपलब्ध नही है। अपोलो मिशनों में इस्तेमाल किये जाने वाला राकेट Saturn V चरणबद्ध तरीके से हटा दिये या सेवानिवृत् किए जा चुके है। अब इस तरह की पुरानी तकनीक का इस्तेमाल वापस नही किया जा सकता है।

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जो अगला कारण है वो है वित्त कारण। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मिशन के लिएकिसी भी देश के लिए सबसे बड़ी बाधा पैसा भी है। तो जो काम करने की जरूरत है, वह काफी हद तक तकनीक के हाथ में है। इसके लिये काफी सारा पैसा चाहिए। नासा के अपोलो मिशन के दौरान भी जो बजट था वो कुल संघीय बजट का लगभग पांच प्रतिशत था। अब, यह एक प्रतिशत से भी कम है।

दरअसल चांद पर किसी इंसान को भेजना एक महंगा सौदा है। लेकिन अब बेहतर ओर कम खर्चीली तकनीक के कारण ही ऐसे मिशन संभव हो पाए है। अब जैसा कि हमने देखा की चीन ने पिछले साल ही अपने मिशन को पूरा किया है जबकि रूस ने 2031 तक चांद पर पहुंचने की योजना बनाई है।

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विशेषज्ञों के मुताबिक पहले के अपोलो मिशन में वैज्ञानिक दिलचस्पी से ज्यादा राजनीतिक कारण थे और ये सब अंतरिक्ष नियंत्रण की होड़ में ये किया गया था।

चित्र सोत्र- गूगल

धन्यवाद।

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