तुम्हारा मन अपने आप सत्संग पीने लगेगा

तुम्हारा मन अपने आप सत्संग पीने लगेगा

मुख की मौन तुम्हे देवता बनाएगी, मन की मौन तुम्हे भगवान बनाएगी। भगवान को में और मेरा होता है क्या? तुम आत्मा है तो तुम मेरा बेटा मेरी स्त्री कैसे बोलता है? सब हमारे घर में भगवान है, एक ही परमात्मा है, ना में किसिका ना कोई मेरा। एक ही परमात्मा ने सब रूप धारण किया है, मेरे अंदर भी वहीं है। जब ये है भी सच, तो तुम्हारे मुख से सच क्यों नहीं निकलता है?

जो लोकरित छोड़ता है वो कृष्ण हो जाता है। जब संसार ही मिथ्या है तो लोक भी मिथ्या है। तुम लोक कि नहीं परमात्मा कि चिंता करो। कृष्ण ने बताया कि मेरा भगत सब चीजों से उपाराम मुझे अति प्रिय है।

गुरु के एक वचन से सारे विचार खत्म हो जाते है
गुरु के एक वचन से सारे विचार खत्म हो जाते है

सबसे बड़ा संग्रह है स्वयं को जानना। इसी संसार में रहकर संसार से उपारम रहना। इसलिए गुरु ने बताया मौन, प्रेम और सेवा। सबमें परमात्मा देखना। जैसे दादा भगवान दुकान पर आते हुए हर ग्राहक को भी भगवान समझ कर सामान दिखाते थे। में क्या करता हूं?

तुम सत्संग में आके बैठो, बिना और कहीं ध्यान दिए। तुम्हारा मन अपने आप सत्संग पीने लगेगा। गुरु के समक्ष बैठने से अंदर की खुशी मिलती है। गुरु मन को पकड़ लेता है, तुम बस सामने आके बैठो। जगत को सच माना है इसलिए परमात्मा नहीं दिखता है। गुरु के सामने बैठने से गुरु अंदर ही अंदर में ज्ञान का घर कर देता है।

मन की मौन वाला ही गुरु की बात समझ सकेगा। गुरु की बात पर ध्यान दो तो गुरु और तुम्हारा मत एक हो जाए। जैसे सनमाइका चिपकाने के लिए फेविकोल लगा के 4-5 घंटे प्रेशर देना पड़ता है, उसके बाद वो एक हो जाता है फिर वो अलग नहीं होता है। तुम भी बैठ के गुरु के समक्ष ज्ञान को सही से पियो, फिर मन गुरु से अलग नहीं होगा।

तुम्हे हर semester पास करना है। राम भी तुम हो, कृष्ण भी तुम हो। तुम्हे राम की तरह मर्यादा भी करनी है, कृष्ण की तरह मर्यादा से उपराम होकर लोक संग्रह भी करना है। पर गुरु की सहमति से। ये गुरु ही बता सकता है कि तुम्हे कब तक मर्यादा करनी है और कहा ऊपराम होना है। गुरु के घेरे में रहोगे, मुड़ते रहोगे तो बनते रहोगे।

गुरु ने हमारे रोम रोम में प्राण डाले है। हमारी मुस्कुराहट से, हमारी खुशी से गुरु बंधा हुआ है। हमारी आत्मशक्ति उभारने में गुरु लगा हुआ है। गुरु के घेरे में रहो।

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